भारत में मानवाधिकार संरक्षण का संवैधानिकीकरण

भारत में मानवाधिकार संरक्षण का संवैधानिकीकरण
-राष्ट्रीय, राज्य एवं जिला मानवाधिकार आयोगों को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने हेतु संशोधित एवं सुदृढ़ प्रस्ताव

  #@संवैधानिक संशोधन का प्रस्तावित ढाँचा
  इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु भारत के संविधान में एक नवीन भाग (भाग 14A) अंतः स्थापित किया जाना प्रस्तावित है, जिसका शीर्षक होगा:

“मानवाधिकार संरक्षण आयोग”
  @इस भाग के अंतर्गत निम्नलिखित अनुच्छेद विधिक रूप से जोड़े जाने प्रस्तावित हैं:
1- अनुच्छेद 338C–राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग
  1. (1) भारत के लिए एक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया जाएगा, जो इस संविधान के अधीन एक स्वायत्त एवं संवैधानिक निकाय होगा।
  2. (2) आयोग में एक अध्यक्ष तथा ऐसे अन्य सदस्य होंगे, जिनकी नियुक्ति इस संविधान द्वारा निर्धारित स्वतंत्र चयन प्राधिकरण की सिफारिश पर की जाएगी।
3. (3) आयोग के कार्य निम्नलिखित होंगे—
    (क) इस संविधान के भाग 3 के अंतर्गत प्रदत्त मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की जाँच करना;
    (ख) मानवाधिकारों के संरक्षण एवं प्रवर्तन हेतु केंद्र सरकार को सिफारिशें करना;
    (ग) मानवाधिकारों की स्थिति का सतत पर्यवेक्षण एवं मूल्यांकन करना;
    (घ) ऐसे अन्य कार्य, जो संसद द्वारा विधि द्वारा निर्धारित किए जाएँ।
1. (4) आयोग को सिविल न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त होंगी, जिनमें साक्ष्य ग्रहण करना, दस्तावेज़ों का समन जारी करना तथा गवाहों को बुलाना सम्मिलित होगा।
2. (5) आयोग अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत करेगा, जिसे संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाएगा, तथा केंद्र सरकार ऐसी रिपोर्ट प्राप्त होने की तिथि से नब्बे दिवस के भीतर अनुपालन संबंधी कार्यवाही रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए बाध्य होगी।


  अनुच्छेद 338D – राज्य मानवाधिकार आयोग

1. (1) प्रत्येक राज्य में एक राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन किया जाएगा, जो इस संविधान के अधीन एक संवैधानिक निकाय होगा।
2. (2) राज्य आयोग की संरचना, शक्तियाँ एवं कार्य राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुरूप होंगे, परंतु उनका क्षेत्राधिकार संबंधित राज्य तक सीमित रहेगा।
3. (3) राज्य सरकार आयोग की सिफारिशों पर साठ दिवस के भीतर अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए बाध्य होगी।
4. (4) अनुपालन में विफलता की स्थिति में आयोग द्वारा प्रेषित अभिलेख स्वतः संबंधित उच्च न्यायालय के संज्ञान में लाए जाने योग्य होंगे, जैसा कि विधि द्वारा निर्धारित किया जाए।


@अनुच्छेद 338E – जिला मानवाधिकार आयोग
  1. (1) प्रत्येक जिले में एक जिला मानवाधिकार आयोग की स्थापना की जाएगी, जो मानवाधिकार संरक्षण की प्रथम पंक्ति की संवैधानिक संस्था होगी।
   2. (2) आयोग के प्रमुख कार्य निम्नलिखित होंगे—
    (क) मानवाधिकार उल्लंघन संबंधी शिकायतों का तत्काल पंजीकरण;
    (ख) शिकायत प्राप्ति के अड़तालीस घंटे के भीतर प्रारंभिक जाँच प्रारंभ करना;
    (ग) पुलिस थानों, कारागारों, अस्पतालों एवं अन्य अभिरक्षा स्थलों का निरीक्षण;
    (घ) पीड़ितों को तात्कालिक अंतरिम राहत एवं संरक्षण हेतु सिफारिश करना;
    (ङ) ऐसे अन्य कार्य, जो राज्य आयोग द्वारा निर्दिष्ट किए जाएँ।
1. (3) जिला आयोग की सिफारिशें प्रथम दृष्टया बाध्यकारी होंगी, जिन्हें केवल राज्य मानवाधिकार आयोग या संबंधित उच्च न्यायालय द्वारा विधि अनुसार स्थगित या निरस्त किया जा सकेगा।
  अनुच्छेद 338F – नियुक्ति, कार्यकाल एवं स्वतंत्रता
  1. (1) सभी मानवाधिकार आयोगों के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति हेतु एक राष्ट्रीय मानवाधिकार चयन प्राधिकरण का गठन किया जाएगा।
  2. (2) उक्त प्राधिकरण में निम्नलिखित सदस्य होंगे—
    (क) भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश;
    (ख) लोकसभा में विपक्ष के नेता;
    (ग) प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक सदस्य;
    (घ) मानवाधिकार क्षेत्र के दो प्रतिष्ठित विशेषज्ञ।
1. (3) अध्यक्ष एवं सदस्यों का कार्यकाल पाँच वर्ष या सत्तर वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक होगा।
2. (4) किसी सदस्य को पद से हटाया जाना केवल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई जाँच एवं अनुशंसा के आधार पर ही संभव होगा, जैसा कि विधि द्वारा निर्धारित किया जाए।

अनुच्छेद 338G – वित्तीय स्वायत्तता
  1. (1) राष्ट्रीय, राज्य एवं जिला मानवाधिकार आयोगों का व्यय क्रमशः भारत की संचित निधि अथवा संबंधित राज्य की संचित निधि पर भारित होगा।
  2. (2) आयोगों के बजट में कटौती अथवा प्रशासनिक नियंत्रण कार्यपालिका द्वारा नहीं किया जा सकेगा, सिवाय संविधान या विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार।
3. (3) प्रत्येक आयोग को अपने आंतरिक प्रशासन हेतु नियम एवं विनियम बनाने की स्वायत्तता प्राप्त होगी।

अनुच्छेद 338H – निर्णयों का प्रभाव एवं न्यायिक समीक्षा

1. (1) आयोगों द्वारा दिए गए निर्णय एवं सिफारिशें विधि द्वारा निर्धारित सीमा तक बाध्यकारी प्रभाव रखेंगी।
2. (2) ऐसे निर्णयों की समीक्षा, संशोधन या निरस्तीकरण केवल संबंधित उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया जा सकेगा।
3. (3) किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुपालन न किए जाने की स्थिति में—
    (क) संबंधित अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही;
    (ख) न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही; तथा
    (ग) पीड़ित को विधि अनुसार क्षतिपूर्ति का अधिकार स्वतः उत्पन्न होगा।

अनुच्छेद 338 I– समयबद्ध निस्तारण व्यवस्था
 1. (1) मानवाधिकार संबंधी शिकायतों का निस्तारण निम्नलिखित समय सीमाओं के भीतर किया जाएगा—
    (क) जिला मानवाधिकार आयोग: साठ दिवस;
    (ख) राज्य मानवाधिकार आयोग: एक सौ बीस दिवस;
    (ग) राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग: एक सौ अस्सी दिवस।
1. (2) निर्धारित समय-सीमा का उल्लंघन होने पर मामला स्वतः उच्चतर आयोग को स्वतः उन्नयन  के लिए प्रेषित माना जाएगा।

परिभाषाएँ 

इस भाग के प्रयोजनों के लिए, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो—

1. “मानवाधिकार” से तात्पर्य इस संविधान के भाग III द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों तथा भारत द्वारा अनुमोदित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों में मान्य अधिकारों से है।
2. “आयोग” से तात्पर्य राष्ट्रीय, राज्य अथवा जिला मानवाधिकार आयोग से है, जैसा संदर्भ में प्रयुक्त हो।
3. “प्रथम दृष्टया बाध्यकारी” से तात्पर्य ऐसे निर्णय से है जो तत्काल प्रभाव से लागू होगा, जब तक कि उसे सक्षम न्यायिक प्राधिकारी द्वारा स्थगित या निरस्त न किया जाए।
4. “स्वतंत्र चयन प्राधिकरण” से तात्पर्य अनुच्छेद 338F के अंतर्गत गठित नियुक्ति निकाय से है।
यह संवैधानिक ढाँचा मानवाधिकार संरक्षण को केवल वैधानिक व्यवस्था से उठाकर संवैधानिक अनिवार्यता के स्तर पर स्थापित करता है। यह प्रस्ताव न केवल संस्थागत सुदृढ़ीकरण का माध्यम है, बल्कि भारत में संवैधानिक न्याय के विकेंद्रीकरण की दिशा में एक संरचनात्मक एवं विधिक रूप से सुदृढ़ सुधार भी है, जिसका उद्देश्य मानव गरिमा, स्वतंत्रता एवं समानता को वास्तविक एवं प्रभावी संरक्षण प्रदान करना है।


साभार : शिखर अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ।

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