चित्तौड़गढ़ के मंडफिया स्थित साँवरिया सेठ का चमत्कारिक इतिहास
चित्तौड़गढ़ के मंडफिया स्थित साँवरिया सेठ का चमत्कारिक इतिहास
-बागुंड गांव के भोलाराम गुर्जर को 1840 में आया था स्वप्न, पेड़ के नीचे मूर्तियों की मिली थी जानकारी
-मंडफिया और भादसौड़ा के बीच बबूल के पेड़ों के नीचे जमीन से निकलीं थीं भगवान कृष्ण की तीन दिव्य मूर्तियां
-जलझूलनी एकादशी के दिन निकलती है भगवान सांवलिया सेठ की भव्य रजत रथयात्रा
-भगवान साँवरिया सेठ को देशभर के व्यापारी व श्रद्धालु मानते हैं अपना "बिजनेस पार्टनर"
चित्तौड़गढ सॆ उदयपुर् की ओर राष्ट्रीय राजमार्ग 76 पर 28 किलोमीटर की दूरी और उदयपुर से चित्तौड़गढ की ओर 82 किलोमीटर की दूरी पर स्थित प्रसिद्ध सेठ श्री सांवलिया जी का प्राकट्य स्थल मंदिर प्रतिवर्ष अपनी सुन्दरता एवं वैशिष्ट्य के चलते हजारों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है, सेठ साँवरिया जी के दर्शन हेतु आप किसी भी समय यहाँ आयें, आपको दर्शनार्थियों की भीड़ ही मिलेगी, श्री सांवलिया जी प्राकट्य स्थल नाम से प्रसिद्ध इस स्थान से सांवलिया सेठ की 3 प्रतिमाओं के उद्गम का भी अपना इतिहास है ।
वर्ष 1840 में तत्कालीन मेवाड राज्य में उदयपुर से चित्तोड़गढ़ जाने के लिए बनने वाली कच्ची सड़क के निर्माण में बागुन्ड गाँव में बाधा बन रहे बबूल के वृक्ष को काटकर खोदने पर वहा से भगवान कृष्ण की सांवलिया स्वरुप 3 प्रतिमाएं निकली थी, वहीं दूसरी ओर बताया जाता है कि वर्ष 1840 में बागुंड गांव के भोलाराम गुर्जर को स्वप्न आया कि मंडफिया और भादसौड़ा के बीच बबूल के पेड़ों के नीचे जमीन में भगवान कृष्ण की तीन दिव्य मूर्तियां दबी हुई हैं, जब ग्रामीणों ने बताई गई जगह पर खुदाई की तो वहां से काले पत्थर की भगवान श्री कृष्ण की तीन अत्यंत सुंदर मूर्तियां प्रकट हुईं, सबसे बड़ी मूर्ति भादसोड़ा के प्राचीन मंदिर में स्थापित की गई, वहीं मंझली मूर्ति उसी प्राकट्य स्थल पर रही जबकि सबसे छोटी मूर्ति भोलाराम गुर्जर के घर पर रखी गई जिसे बाद में मंडफिया के भव्य मंदिर में प्रतिष्ठित किया गया था ।
वर्ष 1978 में विशाल जनसमूह की उपस्थिति में मंदिर पर ध्वजारोहण किया गया, 1961 से मंदिर के निर्माण, विस्तार व सौंदर्यीकरण का जो कार्य शुरू हुआ है, वह आज भी चालू है, इस स्थल पर अब एक अत्यंत ही सेठ साँवरिया जी का बेहद ही नयनाभिराम एवं विशाल मंदिर बन चुका है, 36 फुट ऊँचा एक विशाल शिखर बनाया गया है जिस पर फरवरी 2011 में स्वर्ण जडित कलश व ध्वजारोहण किया गया था ।
वर्ष 1961 से ही इस प्रसिद्ध स्थान पर देवझूलनी एकादशी पर विशाल मेले का आयोजन हो रहा है, प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष की दशमी, एकादशी व द्वादशी को 3 दिवसीय विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, प्रतिमाह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को सांवलिया जी का दानपात्र (भंडार) खोला जाता है और अगले दिन यानी अमावस्या की शाम को महाप्रसाद का वितरण किया जाता है, देवझूलनी यानी जलझूलनी एकादशी के पावन अवसर पर भगवान सांवलिया सेठ की भव्य और पारंपरिक रथयात्रा यानी रजत रथयात्रा का आयोजन किया जाता है ।.jpg)
रथयात्रा के दौरान भगवान सांवलिया सेठ के बाल स्वरूप को करीब 435 किलो चांदी से बने भव्य रथ में विराजमान किया जाता है, राजभोग आरती के बाद भगवान साँवरिया सेठ को नगर भ्रमण के लिए ले जाया जाता है और पारंपरिक रूप से स्नान घाट पर जलझूलनी (स्नान) का आयोजन होता है, रथयात्रा के दौरान हाथी, घोड़े, बैंड-बाजे, सांस्कृतिक झांकियां और बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन की भीड़ रहती हैं, रथयात्रा के रास्ते में गुलाल और गुलाब की पंखुड़ियां उड़ाई जाती हैं, इस अवसर पर मंदिर परिसर में विशेष मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रमों यानी भजन संध्या आदि का आयोजन होता है तथा भक्तों द्वारा आतिशबाजी भी की जाती है ।

औरंगजेब का आक्रमण काल : ऐसा माना जाता है कि मुगलों औरंगजेब के आक्रमण के समय संत दयाराम की जमात ने इन मूर्तियों को बागुंड-भादसौड़ा के खुले मैदान में एक वट-वृक्ष के नीचे सुरक्षित दबा दिया था।
• व्यापारिक साझेदार : देशभर के व्यापारी और श्रद्धालुजन सांवलिया सेठ को अपना 'बिजनेस पार्टनर' मानते हैं, मान्यता है कि व्यापारी अपने व्यापार के मुनाफे का एक हिस्सा जैसे अपनी कुल आय का 5 फीसदी या दस फीसदी या बीस फीसदी हिस्सा यहां श्रद्धा से अर्पित करते हैं जिससे उनके व्यापार या आय में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जाती है, बताया जाता है कि हर महीने शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मंदिर का भंडार (दान पेटी) खोला जाता है जिससे प्राप्त राशि करोड़ों में होती है।
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राजस्थान के चित्तौड़गढ़ के पास मंडपिया में स्थित श्री सांवरिया सेठ के दरबार में भक्त अपनी मन्नत या अर्जी बहुत ही सरल और भावनात्मक तरीके से लगा सकते हैं,
भक्त एक सादे कागज पर अपने मन की बात, पीड़ा, मनोकामना या व्यवसाय या नौकरी से जुड़ी इच्छा साफ-साफ लिख कर मंदिर में भेंट कर सकते हैं, वहीं भक्त अर्जी में अपनी श्रद्धा के अनुसार यह भी लिख सकते हैं कि कार्य पूरा होने पर आप अपनी कमाई या लाभ का एक हिस्सा सांवरिया सेठ को भेंट करेंगे जिसके बाद भक्तों की कमाई में एक चमत्कारिक रूप से बढ़ोत्तरी होती चली जाती है, मान्यता के अनुसार चिट्ठी पर थोड़ी हल्दी लगाएं और उस पर रक्षा सूत्र (कलावा) बांध दें और इस अर्जी को या तो मंडपिया स्थित सांवलिया सेठ के मंदिर में समर्पित करें या फिर अपने घर के पूजा-स्थल पर भगवान की मूर्ति या तस्वीर के सामने सुरक्षित रख दें, जब आपकी मनोकामना पूरी हो जाए, तब परिवार सहित सांवरिया सेठ के दरबार (मंडपिया) में जाकर धन्यवाद दें और अपनी तय की हुई भेंट या चढ़ावा अर्पित करें ।













