इज़राइल अमेरिका ईरान तनाव का भारत पर पड़ेगा दीर्घकालिक प्रभाव

इज़राइल अमेरिका ईरान तनाव का भारत पर पड़ेगा दीर्घकालिक प्रभाव
-इज़राइल अमेरिका ईरान युद्ध का भारत पर प्रभाव विषय आयोजित की गई परिचर्चा
  मथुरा । जन सांस्कृतिक मंच द्वारा “इज़राइल-अमेरिका-ईरान युद्ध का भारत पर प्रभाव” विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया, कार्यक्रम में मुख्य वक्ता दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय मामलों के पत्रकार डॉ. प्रकाश के. रे ने अपने विचार व्यक्त किए, उन्होंने महाविद्या कॉलोनी में स्थित एक होटल में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच उत्पन्न वर्तमान स्थिति को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक कारणों पर ध्यान देना आवश्यक है। 
  उन्होंने बताया कि डॉ0 मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री कार्यकाल में भी ऐसी परिस्थितियां बनी थीं, जब कच्चे तेल के दाम बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गए थे, उस समय विपक्ष मजबूत था जबकि आज देश का विपक्ष अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई देता है जिसका प्रभाव वर्ष 2029 तक देखने को मिल सकता है, प्रश्नोत्तर सत्र में पूछे गए प्रश्न विश्व में मुस्लिमों के विरुद्ध ईसाई और यहूदी क्यों एकजुट हो रहे हैं के उत्तर में उन्होंने कहा कि दुनिया इस समय संक्रमण काल से गुजर रही है और हम एक युगांतकारी परिवर्तन के साक्षी बन रहे हैं ।
   उन्होंने कहा कि आने वाले समय में मुद्रा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। चीन की प्रगति पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि चीन के पास अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने के लिए व्यापक उत्पादन है, जबकि भारत के पास सीमित वस्तुएं हैं, भारत ने रूस से तेल का व्यापार रुपये में किया लेकिन रूस के पास रुपये का बड़ा भंडार जमा हो गया जिसे खर्च करने में कठिनाई हो रही है, अब भुगतान युआन में करने की चर्चा भी सामने आ रही है, डॉ. रे ने कहा कि कोरोना काल में भारत में लोहे की मांग लगभग समाप्त हो गई थी जबकि चीन ने उस समय दुनिया का लगभग 75 प्रतिशत लोहा खरीदा, उन्होंने इसे एक ऐतिहासिक घटना बताया ।
   उनके अनुसार चीन एक वर्ष में जितना लोहा और सीमेंट खपा रहा है, उतना पहले दस वर्षों में भी नहीं खपाता था, वह सोना खरीद रहा है, सबसे अधिक अनाज का उत्पादन कर रहा है और बड़ी मात्रा में खरीद भी कर रहा है, चीन के पास बड़ा उत्पादन और बड़ा बाजार दोनों हैं, जबकि भारत उत्पादन बढ़ाने और बाजार तक पहुँचाने में अभी कमजोर है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और यूरोप आक्रामक रणनीति पर चलते हैं, जबकि चीन अपेक्षाकृत रक्षात्मक नीति अपनाता है। चीन का सिद्धांत है कि सबसे अच्छा युद्ध वही है जिसे लड़ना न पड़े ।
   साथ ही उन्होंने कहा कि दुश्मन को घेरने के बाद उसे पीछे हटने का रास्ता देना चाहिए, अन्यथा वह पूरी ताकत से मुकाबला कर सकता है, भारत सरकार की वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि हाल ही में ईरान के राष्ट्रपति की हत्या पर तीन दिन का शोक रखा गया, किंतु ईरान के सुप्रीम लीडर की मृत्यु पर मौन का कारण स्पष्ट नहीं है, मंच के अध्यक्ष राजकिशोर अग्रवाल ने कहा कि समझदार लोग कभी लड़ाई नहीं करते, उन्होंने एक कविता के माध्यम से अमेरिका इज़राइल ईरान संघर्ष में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा तुम्हारे फायदे के लिए हम क्यों लड़ें, कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे एडवोकेट गौरव अग्रवाल ने कहा कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो पूरी दुनिया में तबाही का मंजर दिखाई दे सकता है जिससे भारत की स्थिति भी प्रभावित होगी, डॉ0 धर्मराज ने मुख्य वक्ता डॉ0 प्रकाश के. रे का परिचय कराया, डॉ0 आर0 के0 चतुर्वेदी, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो0 मिणाल, सुनील आचार्य, डॉ0 अशोक बंसल, रवि सरीन, नरेश शर्मा, सतीश शर्मा, मनोज गौड़, मुकेश धनगर, सुनील शर्मा, कुलदीप कुलश्रेष्ठ, रमन लाल गुप्ता, डॉ0 डी0डी0 गर्ग, आशुतोष गर्ग आदि उपस्थित रहे। 

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