छाता तहसील : बुलडोजर चलने के बावजूद खड़ी हो गई बाउंड्रीवाल ?
छाता तहसील : बुलडोजर चलने के बावजूद खड़ी हो गई बाउंड्रीवाल ?
-गांव बिलौटी का है मामला, एनएचएआई की बताकर भूमि को कर दिया था जमींदोज
-विवादित भूमि पर निजी बाउंड्रीवाल बनने से तहसील प्रशासन पर उठ रहे हैं गम्भीर सवाल
मथुरा । छाता तहसील के गांव बिलौटी से सामने आया एक मामला इन दिनों क्षेत्र में चर्चाओं में बना हुआ है, आरोप इतने गंभीर हैं कि अब तहसील प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं, चहुंओर चल रहीं चर्चाओं में बताया जा रहा है कि जिस जमीन को कुछ समय पहले प्रशासन द्वारा एनएचएआई की भूमि बताते हुए बुलडोजर चलवाकर खाली कराया गया था, आज उसी जमीन पर क्षेत्र के एक प्रभावशाली दबंग द्वारा बाउंड्रीवाल खड़ी कर दी गई है ।

पीड़ित का आरोप है कि जब प्रशासन कार्रवाई करने पहुंचा था, तब कहा गया था कि संबंधित भूमि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआई की है और उस पर अवैध कब्जा किया गया है, इसी आधार पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई थी, उनका कहना है कि उन्हें अपनी बात रखने का पूरा अवसर भी नहीं दिया गया और देखते ही देखते बुलडोजर चल गया लेकिन असली सवाल कार्रवाई के बाद खड़े हुए, स्थानीय लोगों के अनुसार जिस जमीन को सरकारी बताकर खाली कराया गया था, उसी भूमि पर कुछ समय बाद निजी निर्माण की गतिविधियां शुरू हो गईं, अब वहां बाउंड्रीवाल खड़ी दिखाई दे रही है ।
पीड़ित का कहना है कि यदि जमीन वास्तव में एनएचएआई की थी तो उस पर किसी निजी व्यक्ति द्वारा निर्माण कैसे किया जा सकता है ? क्या एनएचएआई ने किसी को अधिकृत किया है ? क्या किसी विभाग ने निर्माण की अनुमति दी है ? यदि नहीं तो फिर यह निर्माण किस आधार पर कराया जा रहा है ? वहीं ग्रामीणों का कहना है कि पहले प्रशासन ने जमीन को सरकारी बताकर खाली कराया और अब उसी जमीन पर निजी बाउंड्रीवाल खड़ी हो जाने से कई तरह के सवाल पैदा हो रहे हैं, गांव में चर्चा का विषय यही है कि आखिर इस पूरी कार्रवाई का वास्तविक उद्देश्य क्या था ?
वहीं जब इस मामले में तहसील प्रशासन का पक्ष जानने का प्रयास किया गया तो तहसीलदार छाता से फोन पर संपर्क किया गया तो उनका फोन रिसीव नहीं हो सका, स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन ने पूरी कार्रवाई नियमों के तहत की है तो जमीन से जुड़े अभिलेख, सीमांकन रिपोर्ट और कार्रवाई का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाना चाहिए जिससे स्थिति स्पष्ट हो जाएगी और लोगों के मन में उठ रहे सवालों का जवाब भी मिल सकेगा, पीड़ित का आरोप है कि उन्हें न्याय नहीं मिल रहा है और वह लगातार अधिकारियों के चक्कर काटने को मजबूर हैं, उनका कहना है कि यदि जमीन सरकारी थी तो उस पर निजी निर्माण नहीं होना चाहिए और यदि निर्माण वैध है तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर किस आधार पर यह अनुमति दी गई ?
फिलहाल यह मामला सिर्फ जमीन के एक टुकड़े तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक कार्रवाई की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर भी गम्भीर सवाल उठ रहे हैं, अब देखना है कि जिला प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष जांच कराता है या नहीं और यदि निष्पक्ष जांच होती है तो आखिर सच क्या निकलकर सामने आता है ? क्योंकि सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है कि जिस जमीन को एनएचएआई की बताकर बुलडोजर चलाया गया था और अब उसी जमीन पर निजी व्यक्ति के द्वारा बाउंड्रीवाल कैसे खड़ी हो गई ? यदि सबकुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो फिर इन सवालों का जवाब देने से आखिर परहेज क्यों किया जा रहा है ?







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