लखनऊ अग्निकाण्ड : "पहले एलडीए पर बुलडोजर चलाओ, फिर चेयरमैन पर"
लखनऊ अग्निकाण्ड : "पहले एलडीए पर बुलडोजर चलाओ, फिर चेयरमैन पर"
पूर्व जिला जज राजेंद्र सिंह ने उठाये व्यवस्था पर सवाल, सभी ने बेच दी खुद्दारी
-अग्निकांड ने उधेड़ दी लखनऊ के शहरी प्रशासन सहित सरकारी व्यवस्था की परतें
-अवैध निर्माण को संरक्षण से मौतें हादसा नहीं, सरकारी व्यवस्था का बनाती हैं अपराधी
अब सवाल अग्निकांड वाली इमारत का नहीं, जिम्मेदारान विभागों के जिम्मेदारानों की कुर्सियों का है
साभार : पत्रकार कुमार सौवीर की फेसबुक वॉल से
लखनऊ । अलीगंज के पुरनिया अग्निकांड ने केवल एक इमारत को नहीं जलाया है, बल्कि लखनऊ के शहरी प्रशासन की विश्वसनीयता, विकास प्राधिकरण की कार्यशैली और जिम्मेदार अफसरों की जवाबदेही को भी आग के घेरे में ला खड़ा किया है। इस दर्दनाक हादसे पर लखनऊ के पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश राजेंद्र सिंह की प्रतिक्रिया असाधारण रूप से तीखी और बेबाक रही। उन्होंने कहा, "सबसे पहले बुलडोजर प्राधिकरण पर चलाओ, फिर उसके चेयरमैन पर चलाओ। सबने अपनी खुद्दारी बेच रखी है। इसकी भरपाई कोई पैसे से नहीं कर सकता।"

एक पूर्व जिला जज के मुंह से निकला यह बयान केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं माना जा सकता। यह उस व्यक्ति की पीड़ा है, जिसने जीवन भर कानून की किताब के अनुसार फैसले दिए और अब उसी कानून को व्यवस्था के सामने असहाय खड़ा देख रहा है। राजेंद्र सिंह के शब्दों में जो आक्रोश है, वह दरअसल उस आम नागरिक का भी आक्रोश है, जो यह समझ नहीं पा रहा कि जिस इमारत के बारे में वर्षों से शिकायतें थीं, जिस पर कार्रवाई की बातें हुई थीं, वह आखिर कैसे मौत का ऐसा जाल बनकर खड़ी रही।

पुरनिया की इस तीन मंजिला इमारत में एनिमेशन कोचिंग सेंटर, लाइब्रेरी, गेमिंग जोन और पेट शॉप जैसी गतिविधियां संचालित हो रही थीं। यह पूरा इलाका मूलतः आवासीय क्षेत्र माना जाता है। सवाल यह है कि यदि यहां व्यावसायिक गतिविधियां चल रही थीं, तो क्या इसकी जानकारी विकास प्राधिकरण को नहीं थी? क्या फायर विभाग ने कभी निरीक्षण नहीं किया? क्या नगर निगम और स्थानीय प्रशासन ने कभी यह देखने की कोशिश नहीं की कि एक आवासीय इमारत में सैकड़ों छात्र प्रतिदिन आ-जा रहे हैं? अगर जानकारी थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और अगर जानकारी नहीं थी, तो फिर इतने बड़े प्रशासनिक तंत्र के होने का औचित्य क्या है?
सोमवार 22 जून 2026 को जब आग लगी, तो देखते ही देखते पूरी इमारत धुएं और लपटों से भर गई। जान बचाने के लिए छात्रों को ऊपरी मंजिलों से छलांग लगानी पड़ी। कई गंभीर रूप से घायल हो गए और करीब 15 युवाओं की जान चली गई। वे छात्र, जिनके माता-पिता ने उन्हें बेहतर भविष्य के सपनों के साथ कोचिंग भेजा था, वे घर वापस नहीं लौट सके। उनकी मौत का कारण केवल आग नहीं थी। उनकी मौत का कारण वह प्रशासनिक लापरवाही भी थी, जिसने समय रहते खतरे को खतरा मानने से इंकार कर दिया।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपना अन्य कार्यक्रम स्थगित कर लखनऊ पहुंचकर राहत और बचाव कार्यों का जायजा लिया। मुआवजे की घोषणा हुई, जांच के आदेश दिए गए। लेकिन यह सवाल अब भी हवा में तैर रहा है कि क्या हर बार यही क्रम दोहराया जाएगा? पहले अवैध निर्माण होगा, फिर अधिकारी आंखें बंद करेंगे, फिर हादसा होगा, फिर मुआवजा मिलेगा और फिर एक नई फाइल खुल जाएगी?
पूर्व जिला जज राजेंद्र सिंह ने इसी चक्र पर प्रहार किया है। उनका कहना है कि यदि सचमुच बुलडोजर चलाना है, तो सबसे पहले उन दफ्तरों पर चलना चाहिए, जहां बैठकर अवैध निर्माणों को संरक्षण दिया जाता है। उन कुर्सियों पर चलना चाहिए, जहां नियमों को फाइलों में दबा दिया जाता है। क्योंकि इमारतें अपने आप नहीं बनतीं। वे तब बनती हैं, जब किसी की आंखें बंद होती हैं, किसी की कलम बिकती है और किसी की जिम्मेदारी समझौते में बदल जाती है।
लखनऊ में यह पहला हादसा नहीं है। इससे पहले भी अग्निकांड और अवैध निर्माणों से जुड़ी घटनाएं सामने आती रही हैं। हर बार कुछ दिन तक सख्ती की बातें होती हैं लेकिन धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है। यही कारण है कि राजेंद्र सिंह जैसे न्यायिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति का यह बयान केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ आरोप-पत्र जैसा प्रतीत होता है।
अब सवाल केवल उस इमारत का नहीं है, जो जल गई। सवाल उन दफ्तरों का है, जहां बैठकर ऐसी इमारतों को खड़े रहने दिया गया। सवाल उन अधिकारियों का है, जिनकी निगरानी में यह सब हुआ और सवाल उस व्यवस्था का है, जो हर हादसे के बाद कठोर दिखती है, लेकिन हादसे से पहले अक्सर मौन रहती है, पुरनिया की राख अभी ठंडी नहीं हुई है। मगर उस राख से उठती आवाज साफ है कि अगर बुलडोजर चलाना ही है, तो उसकी दिशा केवल इमारतों की ओर नहीं, बल्कि उन जिम्मेदार कुर्सियों की ओर भी होनी चाहिए, जहां से लापरवाही और मिलीभगत की शुरुआत होती है।







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