पासपोर्ट प्रक्रिया अव्यवस्था : नागरिकों को परेशान करने वाली प्रणाली
पासपोर्ट प्रक्रिया अव्यवस्था : नागरिकों को परेशान करने वाली प्रणाली
भारत में पासपोर्ट बनवाना एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया होनी चाहिए क्योंकि यह हर नागरिक का वैध अधिकार है परंतु वास्तविकता यह है कि पासपोर्ट प्रक्रिया आज भी अनेक खामियों और अव्यवस्थाओं से घिरी हुई है जिसके कारण आम नागरिकों को अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ता है ।
सबसे बड़ी समस्या है अनावश्यक जटिलता और अस्पष्ट नियम : पासपोर्ट सेवा केंद्रों पर दस्तावेजों की सूची और उनकी व्याख्या इतनी जटिल होती है कि पढ़े-लिखे व्यक्ति भी भ्रमित हो जाते हैं, कई बार वही दस्तावेज़ एक जगह स्वीकार किए जाते हैं तो दूसरी जगह उन्हें खारिज कर दिया जाता है, इससे यह सवाल उठता है कि क्या नियमों की स्पष्टता जानबूझकर नहीं रखी जाती, ताकि लोगों को बार-बार चक्कर लगाने पड़ें।
दूसरी बड़ी खामी है पुलिस वेरिफिकेशन की अव्यवस्था : पुलिस सत्यापन प्रक्रिया आज भी औपनिवेशिक मानसिकता से संचालित होती दिखाई देती है, कई मामलों में पुलिस कर्मी अनावश्यक सवाल पूछते हैं, बार-बार घर आने की बात कहते हैं या फाइल को लंबित रख देते हैं। इससे आवेदकों को मानसिक तनाव और समय की बर्बादी दोनों झेलनी पड़ती हैं।
तीसरी समस्या है ऑनलाइन प्रणाली की सीमाएँ : सरकार ने पासपोर्ट प्रक्रिया को डिजिटल बताकर आधुनिकता का दावा किया है लेकिन हकीकत में वेबसाइट की तकनीकी समस्याएँ, स्लॉट की कमी और सर्वर की धीमी गति लोगों के लिए नई मुसीबत बन जाती हैं, कई बार महीनों तक अपॉइंटमेंट नहीं मिल पाता जिससे यह डिजिटल प्रणाली भी आम नागरिक के लिए बोझ बन जाती है।
इसके अतिरिक्त अधिकारिक विवेकाधिकार का दुरुपयोग भी एक गंभीर समस्या है, कई बार मामूली त्रुटियों के आधार पर आवेदन रोक दिए जाते हैं या अतिरिक्त दस्तावेज़ मांग लिए जाते हैं, यह प्रवृत्ति नागरिकों के अधिकारों के साथ अन्याय है और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है, सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में नागरिक को सेवा लेने वाला नहीं बल्कि दोषी मान लिया जाता है, ऐसा प्रतीत होता है मानो आवेदक को हर कदम पर अपनी ईमानदारी साबित करनी पड़े ।
यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के उस सिद्धांत के विपरीत है जिसमें राज्य को नागरिक की सुविधा के लिए काम करना चाहिए, अब समय आ गया है कि सरकार पासपोर्ट प्रक्रिया में नियमों की स्पष्टता, पुलिस सत्यापन की पारदर्शिता और डिजिटल प्रणाली की वास्तविक दक्षता सुनिश्चित करे, जब तक इन खामियों को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक पासपोर्ट सेवा एक अधिकार नहीं बल्कि एक संघर्ष बनी रहेगी, यदि प्रशासन वास्तव में “ईज ऑफ लिविंग” और “डिजिटल इंडिया” की बात करता है तो उसे सबसे पहले ऐसी प्रक्रियाओं को नागरिक-हितैषी बनाना होगा अन्यथा पासपोर्ट प्रणाली आधुनिक भारत के दावों पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न बनी रहेगी ।
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साभार : शिखर अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ







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