गम्भीर मुद्दा नहीं अतिआवश्यक : सत्ता के दुरुपयोग पर बनना चाहिए कानून

गम्भीर मुद्दा नहीं अतिआवश्यक : सत्ता के दुरुपयोग पर बनना चाहिए कानून
   भारत में लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सत्ता का प्रयोग संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर रहकर किया जाए, जब सत्ता जनहित के बजाय व्यक्तिगत, राजनीतिक अथवा प्रतिशोधात्मक उद्देश्यों की पूर्ति का साधन बन जाती है, तब लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है, यही कारण है कि भारत में सत्ता के दुरुपयोग को रोकने हेतु एक प्रभावी और व्यापक कानून की आवश्यकता आज पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है ।
   सत्ता का दुरुपयोग केवल भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं है, यह तब भी होता है जब सरकारी एजेंसियों का प्रयोग राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए किया जाता है, जब प्रशासनिक निर्णय निष्पक्षता के बजाय पक्षपात से प्रेरित होते हैं, या जब नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन किया जाता है, ऐसी परिस्थितियाँ न केवल कानून के शासन को कमजोर करती हैं, बल्कि आम जनता के मन में शासन और न्यायपालिका के प्रति अविश्वास भी उत्पन्न करती हैं।
   भारतीय संविधान ने शासन की प्रत्येक शाखा को सीमित और उत्तरदायी बनाने का प्रयास किया है, फिर भी व्यावहारिक स्तर पर अनेक बार यह देखा गया है कि शक्तियों का प्रयोग संविधान की भावना के विपरीत किया जाता है, जांच एजेंसियों के दुरुपयोग, प्रशासनिक मनमानी, चयनात्मक कार्रवाई तथा राजनीतिक प्रतिशोध जैसी घटनाएँ समय-समय पर सार्वजनिक विमर्श का विषय बनती रही हैं, यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए चिंताजनक है।
   ऐसे में एक विशेष कानून बनाया जाना चाहिए, जो सत्ता के दुरुपयोग की स्पष्ट परिभाषा निर्धारित करे, इस कानून के अंतर्गत यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई भी लोकसेवक, मंत्री, अधिकारी अथवा संवैधानिक पदाधिकारी अपने अधिकारों का प्रयोग निजी या राजनीतिक लाभ के लिए न कर सके, यदि ऐसा होता है तो उसके विरुद्ध स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की व्यवस्था हो।
   इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्रीय प्राधिकरण या आयोग का गठन किया जा सकता है, जो कार्यपालिका से पूर्णतः स्वतंत्र हो और संसद के प्रति उत्तरदायी हो, इस संस्था को शिकायतों की जांच, अभियोजन की अनुशंसा तथा वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने की शक्ति प्रदान की जानी चाहिए, इससे जांच प्रक्रिया में निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित होगी, कानून में यह भी प्रावधान होना चाहिए कि सत्ता के दुरुपयोग से प्रभावित व्यक्ति को त्वरित न्याय प्राप्त हो, इसके लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना की जा सकती है, जो ऐसे मामलों का समयबद्ध निस्तारण करें, दोषी पाए जाने पर कठोर दंड, पद से अयोग्यता तथा आर्थिक दायित्व जैसे प्रावधान किए जाने चाहिए।
   अधिवक्ताओं, न्यायविदों और नागरिक समाज की भूमिका इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है, जनहित याचिकाओं, विधिक जागरूकता अभियानों, सेमिनारों और सार्वजनिक चर्चाओं के माध्यम से इस विषय को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया जा सकता है, जब समाज स्वयं इस मांग को उठाएगा, तभी राजनीतिक इच्छाशक्ति भी विकसित होगी, भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करना केवल कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि संवैधानिक अनिवार्यता है ।
    एक ऐसा कानून, जो सत्ता के दुरुपयोग पर प्रभावी अंकुश लगाए, लोकतंत्र को और अधिक सुदृढ़ करेगा, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करेगा तथा शासन में जनता के विश्वास को पुनर्स्थापित करेगा, अंततः सत्ता सेवा का माध्यम है, स्वार्थ का नहीं, यदि लोकतंत्र को जीवंत, सशक्त और विश्वसनीय बनाए रखना है तो सत्ता के दुरुपयोग को रोकने हेतु कठोर, निष्पक्ष और प्रभावी कानून का निर्माण समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है ।


साभार : शिखर अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ खण्डपीठ ।

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