लखनऊ में अवैध निर्माण का साम्राज्य : जिम्मेदार कौन ?

लखनऊ में अवैध निर्माण का साम्राज्य : जिम्मेदार कौन ?

  लखनऊ जिसे तहज़ीब और योजनाबद्ध विकास का शहर कहा जाता है, आज अवैध निर्माण की अराजकता में घिरता जा रहा है, सवाल सीधा है "क्या यह सब केवल बिल्डरों की मनमानी है या इसके पीछे प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार की गहरी परतें हैं ?", सच्चाई यह है कि लखनऊ में अवैध निर्माण अब अपवाद नहीं, बल्कि एक खतरनाक “नॉर्म” बन चुका है, रिहायशी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियाँ, नक्शे के विपरीत कई मंज़िलें और बिना अनुमति के निर्माण", ये सब खुलेआम हो रहा है और यह सब तब हो रहा है, जब इसकी निगरानी की जिम्मेदारी पूरी तरह से लखनऊ विकास प्राधिकरण के पास है ।

 

@लापरवाही या मिलीभगत ?

 प्रश्न यह नहीं है कि एलडीए को जानकारी नहीं है—प्रश्न यह है कि "जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं होती ?", जब कोई निर्माण महीनों तक नियमों का उल्लंघन करता है तो यह मानना कठिन है कि अधिकारी अनजान हैं, क्या यह महज लापरवाही है या फिर “नज़रअंदाज़ करने” की एक सुनियोजित संस्कृति ?", शहर में यह आम धारणा बन चुकी है कि “बिना सेटिंग के एक ईंट भी नहीं रखी जा सकती है” अगर यह धारणा गलत है तो "एलडीए को इसे अपने कार्यों से गलत साबित करना होगा—सिर्फ बयानबाज़ी से नहीं" ।

 

@चुनिंदा कार्रवाई का खेल

   छोटे मकान मालिकों पर बुलडोज़र चलाना आसान है लेकिन बड़े बिल्डरों और प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कार्रवाई अक्सर ठंडी पड़ जाती है, यह “चुनिंदा सख्ती” ना केवल कानून के शासन पर सवाल उठाती है, बल्कि आम नागरिक के विश्वास को भी तोड़ती है ।

 

@न्यायपालिका की सख्त टिप्पणियाँ

   इलाहाबाद हाईकोर्ट समय-समय पर विकास प्राधिकरणों को फटकार लगाता रहा है, अदालतों ने स्पष्ट कहा है कि अवैध निर्माण केवल बिल्डरों की गलती नहीं, बल्कि अधिकारियों की विफलता भी है, इसके बावजूद जमीनी हकीकत में बहुत कम बदलाव दिखता है ।

 

@आम जनता पर बोझ

  इस अव्यवस्था का खामियाज़ा आम नागरिक भुगत रहा है—

# सड़कों पर बढ़ता ट्रैफिक जाम

#जलनिकासी और बिजली व्यवस्था पर दबाव

# अग्नि सुरक्षा जैसे गंभीर खतरे

 

  जब एक रिहायशी इलाके में अचानक एक व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स खड़ा हो जाता है तो पूरा इलाका उसकी कीमत चुकाता है।

 

 @समाधान क्या है ? "अब आधे-अधूरे उपायों से काम नहीं चलेगा" जरूरत है : -

#जवाबदेही तय करने की : हर अवैध निर्माण के लिए जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई

#टेक्नोलॉजी आधारित निगरानी : रियल टाइम मॉनिटरिंग और सार्वजनिक डेटा

#पारदर्शिता : स्वीकृत नक्शों और निर्माण की स्थिति को ऑनलाइन करना

# राजनीतिक हस्तक्षेप पर रोक

 

@अंतिम सवाल : "लखनऊ को अवैध निर्माण की इस अराजकता से आखिर कौन बचाएगा ?", क्या एलडीए अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करेगा या फिर शहर यूँ ही “अनियोजित विकास” के नाम पर बर्बादी की ओर बढ़ता रहेगा ?, जब कानून लागू करने वाली संस्था ही सवालों के घेरे में हो तो यह केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि यह शहर के भविष्य का संकट बन जाता है ।

साभार : शिखर अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ ।

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