नया आयकर क़ानून : मौलिक अधिकारों के संदर्भ में एक संतुलित संवैधानिक विमर्श

नया आयकर क़ानून : मौलिक अधिकारों के संदर्भ में एक संतुलित संवैधानिक विमर्श

  प्रस्तावना 
  कराधान किसी भी आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य की शासन-व्यवस्था का एक अनिवार्य अंग है । इसके माध्यम से सरकार सार्वजनिक कल्याण, आधारभूत संरचना और राष्ट्रीय विकास के लिए आवश्यक संसाधन जुटाती है । साथ ही, यह भी उतना ही आवश्यक है कि कर संबंधी विधायी प्रावधान संवैधानिक मूल्यों, मौलिक अधिकारों और विधि के शासन के अनुरूप हों ।
   आयकर क़ानून में हाल में किए गए कुछ परिवर्तनों ने विद्वानों, कर विशेषज्ञों और विधि-जगत में यह विमर्श प्रारंभ किया है कि इन प्रावधानों का मौलिक अधिकारों के साथ संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है । यह लेख किसी टकराव की भावना से नहीं, बल्कि संवैधानिक सामंजस्य और सुधार की दृष्टि से नए आयकर क़ानून के कुछ पहलुओं का विश्लेषण प्रस्तुत करता है ।
 
   1. समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) के संदर्भ में विचार : अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समानता और मनमानेपन के निषेध का सिद्धांत स्थापित करता है । कराधान के क्षेत्र में भी यह अपेक्षा रहती है कि कर व्यवस्था युक्तिसंगत वर्गीकरण और न्यायोचित आधार पर आधारित हो ।
   (क) विभिन्न करदाता वर्गों पर कर भार : नए आयकर क़ानून के अंतर्गत यह अनुभव किया गया है कि वेतनभोगी करदाताओं पर स्रोत पर कर कटौती के माध्यम से अनुपालन अपेक्षाकृत कठोर है जबकि कुछ अन्य वर्गों को छूटों और जटिल कर संरचनाओं का लाभ प्राप्त होता है । यह आवश्यक प्रतीत होता है कि कर भार का वितरण इस प्रकार हो कि सभी वर्गों में समानता और विश्वास की भावना बनी रहे ।
   (ख) पूर्ववर्ती लेन-देन की पुनः समीक्षा : कर प्रशासन को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से पूर्ववर्ती लेन-देन की समीक्षा की व्यवस्था की गई है, तथापि यह भी अपेक्षित है कि ऐसी शक्तियों का प्रयोग विधिक निश्चितता और पूर्वानुमेयता के सिद्धांतों के अनुरूप हो जिससे करदाताओं में अनावश्यक अनिश्चितता उत्पन्न नही हो ।

   2. संपत्ति के अधिकार (संविधान के अनुच्छेद 300A) के परिप्रेक्ष्य में संतुलन : यद्यपि संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है, फिर भी अनुच्छेद 300A के अंतर्गत यह एक संवैधानिक संरक्षण प्राप्त अधिकार है । कराधान के माध्यम से राज्य का उद्देश्य संपत्ति का अधिग्रहण नहीं, बल्कि न्यायोचित राजस्व संग्रह होता है ।
    (क) कर दरें और आर्थिक स्थिरता : प्रगतिशील कराधान सामाजिक संतुलन के लिए आवश्यक है, किंतु यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि कर दरें ऐसी हों जो विधिसम्मत रूप से अर्जित संपत्ति और आर्थिक स्थिरता को अनावश्यक रूप से प्रभावित नही करें ।
   (ख) वसूली और प्रवर्तन की प्रक्रिया : कर वसूली से संबंधित शक्तियों का प्रयोग यदि उचित प्रक्रियात्मक सुरक्षा और न्यायिक पर्यवेक्षण के साथ किया जाए, तो इससे कर प्रशासन में पारदर्शिता और जनविश्वास दोनों सुदृढ़ हो सकते हैं ।

  3. निजता के अधिकार (अनुच्छेद 21) और कर प्रशासन : सुप्रीम कोर्ट द्वारा निजता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दिए जाने के पश्चात, कर प्रशासन में सूचना-संग्रह और निगरानी के उपायों को आवश्यकता और आनुपातिकता के सिद्धांतों के अनुरूप संतुलित करना अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है ।
   (क) वित्तीय जानकारी का प्रकटीकरण : डिजिटल लेन-देन और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय गतिविधियों की निगरानी कर-चोरी की रोकथाम के लिए उपयोगी है, किंतु इसके साथ डेटा सुरक्षा और गोपनीयता के प्रभावी तंत्र का सुदृढ़ होना भी उतना ही आवश्यक है ।
  (ख) प्रौद्योगिकी का विवेकपूर्ण उपयोग : AI और डेटा एनालिटिक्स कर प्रशासन को अधिक कुशल बना सकते हैं, यदि इनका प्रयोग स्पष्ट दिशानिर्देशों और जवाबदेही तंत्र के साथ किया जाए तो यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रशासनिक दक्षता के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है ।

  4. व्यापार और पेशा करने का अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(g)) : व्यापार और उद्यमिता आर्थिक विकास के प्रमुख स्तंभ हैं, कर अनुपालन व्यवस्था का उद्देश्य इन्हें नियंत्रित करना नहीं, बल्कि सुव्यवस्थित और पारदर्शी ढंग से संचालित करना होना चाहिए ।
   (क) अनुपालन आवश्यकताओं का सरलीकरण : यह अनुभव किया गया है कि अनुपालन संबंधी प्रक्रियाओं की जटिलता विशेष रूप से लघु और मध्यम उद्यमों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है, यदि प्रक्रियाओं का सरलीकरण किया जाए तो कर आधार भी व्यापक होगा और आर्थिक गतिविधियाँ भी प्रोत्साहित होंगी ।
   (ख) दंडात्मक प्रावधानों में संतुलन : दंडात्मक प्रावधानों का उद्देश्य निवारण होना चाहिए, ना कि भय का वातावरण । प्रक्रियात्मक त्रुटियों और जानबूझकर की गई कर-चोरी के बीच स्पष्ट अंतर कर व्यवस्था को अधिक न्यायसंगत बना सकता है ।
  #निष्कर्ष
  @नया आयकर क़ानून राजस्व सृजन और कर प्रशासन को प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है, तथापि इसकी निरंतर समीक्षा इस दृष्टि से आवश्यक है कि यह मौलिक अधिकारों, संवैधानिक मूल्यों और आर्थिक व्यवहारिकता के साथ संतुलन बनाए रखे, यदि कर नीति को पारदर्शिता, आनुपातिकता और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप परिष्कृत किया जाए, तो यह ना केवल संवैधानिक रूप से सुदृढ़ होगी, बल्कि करदाताओं के विश्वास को भी मजबूत करेगी, ऐसी संतुलित कर व्यवस्था ही एक न्यायपूर्ण, स्थिर और लोकतांत्रिक आर्थिक ढाँचे की आधारशिला बन सकती है ।


साभार : शिखर अधिवक्ता इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ ।

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