दृष्टिपात : उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पुलिस व्यवस्था ?

दृष्टिपात : उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पुलिस व्यवस्था ?
-क्रिकेट मैचों के दौरान ही कड़ी पुलिस व्यवस्था क्यों ? जबकि आम दिनों में अव्यवस्था झेलती है जनता
   लखनऊ में बड़े क्रिकेट मैचों के दौरान दिखाई देने वाली पुलिस और प्रशासनिक सक्रियता एक गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़ा करती है, आख़िर क्यों राज्य की मशीनरी केवल क्रिकेट मैचों के समय ही अत्यधिक सतर्क, अनुशासित और प्रभावी दिखाई देती है जबकि सामान्य दिनों में नागरिक ट्रैफिक जाम, अव्यवस्थित सड़कों, कमजोर पुलिसिंग, अतिक्रमण, अवैध पार्किंग और कानून-व्यवस्था की समस्याओं से लगातार जूझते रहते हैं ?
   जब भी भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी इकाना क्रिकेट स्टेडियम में कोई बड़ा मैच होता है, पूरा शहर अचानक बदल जाता है तुरंत भारी पुलिस बल तैनात हो जाता है, बैरिकेडिंग लग जाती है, ट्रैफिक डायवर्जन लागू हो जाता है, हर चौराहे पर पुलिस दिखाई देती है, निगरानी बढ़ जाती है और प्रशासन अभूतपूर्व सक्रियता दिखाने लगता है, सड़कें अचानक साफ हो जाती हैं, नियम सख्ती से लागू होने लगते हैं, वीआईपी रूट सुरक्षित किए जाते हैं, ऐसा प्रतीत होता है मानो शहर में प्रशासनिक क्षमता की कोई कमी ही नहीं है।
  वहीं दूसरी ओर सामान्य दिनों में यही नागरिक घंटों ट्रैफिक जाम झेलते हैं, अवैध पार्किंग से परेशान रहते हैं, सड़क सुरक्षा के अभाव का सामना करते हैं, पुलिस की सीमित मौजूदगी देखते हैं और अव्यवस्थित शहरी प्रबंधन का शिकार होते हैं, यहीं से एक गंभीर कानूनी और नैतिक प्रश्न उत्पन्न होता है :-
 @क्या राज्य की जिम्मेदारी केवल क्रिकेट मैचों जैसे बड़े आयोजनों तक सीमित है या सामान्य नागरिकों की रोज़मर्रा की सुरक्षा और सुविधा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है ?
 ∆अनुच्छेद 14 और समानता का सिद्धांत
 ◆भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 राज्य को मनमानी करने से रोकता है,
राज्य की हर कार्यवाही न्यायसंगत व तर्कसंगत और समान होनी चाहिए।
  @यह तर्क नहीं है कि क्रिकेट मैचों को सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए, निश्चित रूप से बड़े आयोजनों में भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा आवश्यक है लेकिन प्रश्न यह है कि जब प्रशासन यह साबित कर देता है कि पर्याप्त पुलिस बल उपलब्ध है, प्रभावी ट्रैफिक नियंत्रण संभव है, प्रशासनिक समन्वय किया जा सकता है और शहर को व्यवस्थित रूप से संचालित किया जा सकता है तो फिर यही व्यवस्था सामान्य दिनों में क्यों नहीं दिखाई देती ?
 @@संविधान यह नहीं कहता कि व्यावसायिक खेल आयोजन महत्वपूर्ण हैं और आम नागरिकों की रोज़मर्रा की समस्याएँ कम महत्वपूर्ण हैं।

  ∆अनुच्छेद 21 और गरिमामय जीवन का अधिकार
 ◆सुप्रीम कोर्ट ने कई निर्णयों में अनुच्छेद 21 के तहत “जीवन के अधिकार” को केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं माना गया है, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी माना है, यदि नागरिक घंटों जाम में फंसे रहें, एम्बुलेंस देर से पहुंचे, अधिवक्ता अदालत नही पहुंच सकें, व्यवसाय प्रभावित हों या आम लोगों की आवाजाही बाधित हो तो यह केवल “असुविधा” नहीं रह जाती बल्कि नागरिक अधिकारों का प्रश्न बन जाती है ।
 @@लखनऊ जैसे शहरों में, जहां पहले से ही ट्रैफिक और बुनियादी ढांचे पर दबाव है, मैच वाले दिन स्थिति कई बार नागरिक जीवन को लगभग ठप कर देती है ।
  ##“प्रोपोर्शनैलिटी” का सिद्धांत !!
 आधुनिक संवैधानिक कानून में “Doctrine of Proportionality” यानी “अनुपातिकता का सिद्धांत” अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुका है, कानूनी प्रश्न यह बनता है कि क्या नागरिकों पर लगाए गए प्रतिबंध उस उद्देश्य की तुलना में उचित और संतुलित हैं ?
  सुरक्षा आवश्यक है लेकिन क्या पूरे इलाके को बाधित करना आवश्यक है ?
 क्या अत्यधिक बैरिकेडिंग ही एकमात्र उपाय है ?
 क्या बेहतर शहरी योजना से जनता की परेशानी कम नहीं की जा सकती ?
 क्यों सामान्य नागरिक प्रशासनिक अव्यवस्था की कीमत चुकाएँ ?
 ★यदि कम प्रतिबंधात्मक उपाय उपलब्ध हों तो अत्यधिक प्रतिबंध मनमाना माना जा सकता है ।
 ∆व्यावसायिक मनोरंजन बनाम जनहित
 ◆आज का क्रिकेट केवल खेल नहीं रह गया है, विशेषकर फ्रेंचाइज़ी आधारित क्रिकेट लीग अरबों रुपये के प्रसारण अधिकार, प्रायोजन, कॉर्पोरेट हित, वीआईपी उपस्थिति और राजनीतिक दृश्यता से जुड़ी हुई हैं लेकिन इन आयोजनों की कीमत अक्सर आम जनता चुकाती है सार्वजनिक सड़कें बंद होती हैं, पुलिस बल का बड़ा हिस्सा वहीं लगा दिया जाता है, नागरिकों की आवाजाही बाधित होती है और आम जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।
 @इसलिए यह प्रश्न स्वाभाविक है :- क्या राज्य के संसाधनों का अत्यधिक उपयोग व्यावसायिक मनोरंजन के लिए होना चाहिए, जबकि सामान्य नागरिक रोज़ बुनियादी सुरक्षा और व्यवस्था के लिए संघर्ष करें ?
 ∆जनता के मन में पैदा होता अविश्वास
 चयनात्मक प्रशासनिक सक्रियता जनता के विश्वास को कमजोर करती है, जब नागरिक देखते हैं कि ट्रैफिक नियंत्रण संभव है, सड़कें खाली कराई जा सकती हैं, पुलिस हर जगह तैनात हो सकती है और प्रशासन कुशलता से काम कर सकता है तो वे यह सवाल पूछना शुरू करते हैं कि यही व्यवस्था रोज़ क्यों नहीं दिखाई देती?
  @@धीरे-धीरे यह धारणा बनती है:
  “राज्य तब पूरी ताकत से काम करता है जब बड़े आयोजन, वीआईपी या आर्थिक हित जुड़े हों, लेकिन सामान्य नागरिकों की समस्याओं पर उतनी गंभीरता नहीं दिखाई जाती”, लोकतंत्र के लिए यह धारणा खतरनाक है ।
  ∆न्यायिक समीक्षा की संभावना
  यदि इस विषय पर जनहित याचिका (PIL) दायर की जाए और उसके साथ ट्रैफिक डेटा, एम्बुलेंस देरी के रिकॉर्ड, नागरिक शिकायतें, तस्वीरें और प्रशासनिक असमानता के प्रमाण प्रस्तुत किए जाएँ तो न्यायालय यह जांच कर सकता है कि:
  * क्या प्रतिबंध अत्यधिक हैं?
  * क्या नागरिकों के अधिकारों की अनदेखी हो रही है?
  * क्या बेहतर विकल्प उपलब्ध थे?
  * क्या प्रशासन अनुपातिक तरीके से कार्य कर रहा है?
  @@हालांकि अदालतें सामान्यतः सुरक्षा नीति में हस्तक्षेप नहीं करतीं लेकिन यदि कार्यवाही मनमानी या असंतुलित प्रतीत हो तो न्यायिक हस्तक्षेप संभव है ।
  ∆समाधान क्या होना चाहिए ?
   समाधान यह नहीं है कि क्रिकेट मैचों की सुरक्षा कम कर दी जाए, समाधान यह है कि जो प्रशासनिक क्षमता मैचों के दौरान दिखाई देती है, वही सामान्य दिनों में भी नागरिकों के लिए दिखाई दे, यदि राज्य मैचों के समय अनुशासन ला सकता है, ट्रैफिक नियंत्रित कर सकता है, पुलिस बल प्रभावी ढंग से तैनात कर सकता है तो आम नागरिकों को भी यह अपेक्षा करने का पूरा अधिकार है कि रोज़ बेहतर ट्रैफिक प्रबंधन हो, कानून-व्यवस्था मजबूत हो, एम्बुलेंस कॉरिडोर सुरक्षित हों और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित हो 
  @@एक लोकतांत्रिक शहर केवल स्टेडियम, वीआईपी मूवमेंट और बड़े आयोजनों के लिए नहीं चलता, वह उन सामान्य नागरिकों के लिए चलता है जिनके करों से पूरा प्रशासनिक ढांचा संचालित होता है, अंततः असली प्रश्न यह नहीं है कि क्रिकेट मैचों को सुरक्षा क्यों मिलती है, असली प्रश्न यह है कि आम नागरिकों को वही गंभीरता और संवेदनशीलता रोज़ क्यों नहीं मिलती है ?
साभार : शिखर अधिवक्ता उच्च न्यायालय लखनऊ पीठ ।

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