ईश्वर को भय से नहीं प्रेम से पुकारा जाता है-साध्वी ऋतंभरा
ईश्वर को भय से नहीं प्रेम से पुकारा जाता है-साध्वी ऋतंभरा
मथुरा । वात्सल्य ग्राम में परम शक्ति पीठ के द्वारा ध्यान साधना वेदांत प्रशिक्षण वर्ग का आयोजन किया गया जिसमें वात्सल्य गंगा की सात प्रदेशों की 67 बहनों ने भाग लिया, साध्वी ऋतम्भरा ने कहा कि हमारा दृष्टिकोण ही यह तय करता है कि कौन कैसा है, हमें दूसरों में अवगुण नहीं गुण देखना चाहिए, जब हम दूसरों में दोष देखते हैं तो हमें दर्द होता है और जब हम दूसरों के गुण देखे हैं तो प्रसन्नता मिलती है ।
उन्होंने कहा कि सुख-दुरूख तो आते ही रहते हैं, हमें जो भी मिले उसे हम प्रसन्नता से साथ ग्रहण करना चाहिए, हम जब भी किसी से मिले तो उनसे सुखद वार्ता करें, अच्छी बातें करें तो उनको सुकून मिलेगा, जो लोग सकारात्मक सोच के होते हैं, वह प्रतिकूलता को भी अनुकूलता में बदल देते हैं, प्रारब्ध को सभी को भोगना पड़ता है, जो अपने समर्थ गुरु को छोड़कर इधर-उधर भटकता है वह दुर्भाग्यशाली होता है, ईश्वर को भय से नहीं प्रेम से पुकारा जाता है, हमें अपने बच्चों में ज्ञान की शिक्षा के साथ-साथ व्यवहारिक एवं नैतिक शिक्षा का भी ज्ञान कराना चाहिए ।
स्वामी सूर्यानंद ने कहा कि हिंदू संस्कृति एक जीवन पद्धति है, हिंदू संस्कृति को किसी एक उपासना पद्धति से नहीं बांधा जा सकता, किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी संस्कृति से ही होती है, मुख्य वक्ता हरिशंकर शर्मा ने कहा कि हमें ऊंच नीच छुआछूत के भाव को छेड़ना होगा तभी समाज में एक रूपता का भाव जाग्रत होगा, इससे पूर्व वर्ग में आसाम, बंगाल, हिमांचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, झारखण्ड, मध्यप्रदेश, बिहार एवं नेपाल से 67 बेटियों ने भाग लिया, स्वामी सत्यशील, स्वामी सत्यश्रवा, स्वामी सत्यालोकानंद आदि ने भाग लिया, शिविर का संचालन डाँ0 उमाशंकर राही ने किया ।







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