मुडिया मेला : संतों ने निकाली परंपरागत भव्य शोभायात्रा
मुडिया मेला : संतों ने निकाली परंपरागत भव्य शोभायात्रा
-सत्कोसीय परिक्रमा में उमडा जनसैलाब, गिरिराज जी के जयघोष से गूंजी तलहटी
मथुरा । गोवर्धन पर्वत के ऊपर आसमान में घुमडते बरसते घने काले मेघा और तलहटी में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड, तलहटी में द्वापर कालीन अद्भुत दृश्य उपस्थित हो रहा था, मानो इंद्रदेव अपने रौद्र रूप में हो और ब्रजवासी अपने कान्हा के भरोसे गोवर्धन पर्वत के इर्द गिर्द एकत्रित हो गये हौं, मुडिया मेला में पूर्णमासी की रात को यह सब श्रद्धालुओं को रोमांचित कर रहा था, सप्तकोसीय परिक्रमा मार्ग भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों से गुंजायमान था, सब की टेर कान्हा से लगी थी, जनसैलाब उमड पडा, गिरिराज तलहटी जय घोष से गुजायमान हो उठी।

गुरू पूर्णिमा के दिन में गिरिराज तलहटी गोवर्धन में मुड़िया शोभायात्रा धूमधाम से निकाली गई जिसमें मुड़िया संत ढोल मृदङ्ग की थापों पर नाचते हुए इस प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते हुए नजर आए, यात्रा ने चकलेश्वर से शुरू होकर संपूर्ण कस्बे में भ्रमण किया, मुड़िया शोभायात्रा गिरिराज तलहटी गोवर्धन में लगने वाले मुड़िया मेला का रविवार को मुड़िया शोभायात्रा के साथ समाप्त हो गया, मुड़िया शोभायात्रा में मुड़िया संत ढोल मृदङ्ग खंजरी की थापों पर नाचते गाते हुए अपने गुरु की याद में इस प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते नजर आए, यात्रा राधा श्याम सुन्दर मंदिर से निकली और चकलेश्वर से होते हुए दसविसा हरदेव जी मन्दिर बिजलीघर से होते हुए दानघाटी मन्दिर बड़ा बाजार हाथी दरवाजा होकर अपने गंतव्य स्थान पर पहुंची ।
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मुड़िया शोभायात्रा में सैकङों संत महात्मा साधु सन्यासिन एवं स्थानीय लोगों ने भाग लिया, शोभायात्रा का जगह जगह स्वागत हुआ, यह परम्परा लगभग 470 साल पहले शुरू हुई, जब माधव गौडीय सम्प्रदाय के आचार्य श्रीपाद सनातन गोस्वामी श्री चौतन्य महाप्रभु के आदेश पर ब्रजभूमि पधारे तो यहां वृन्दावन के बाद गोवर्धन ही उनकी भजन स्थली बनी, सनातन गोस्वामी अपने बालों का मुंडन कर भजन साधना में लीन रहते थे इसलिए सभी उन्हें मुडिया बाबा के नाम से जानते थे, गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करना उनके नित्यकर्म में शामिल था, जब उन्होंने गुरू पूर्णिमा के दिन अपना शरीर छोडा तो गुरु की आज्ञा अनुसार उनके अनुयायियों ने अपने बालों का मुंडन कर मुड़िया शोभायात्रा निकाली, गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा की थी, तब से यह परंपरा चली आ रही है ।
मुड़िया संत इतनी चिलचिलाती धूप में भी ढोल मृदङ्ग खंजरी की थापों पर नाचते गाते हुए अपने गुरु की याद में इस प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते हैं, सात कोस की परिक्रमा में मानो आस्था, श्रद्धा और विश्वास से ओतप्रोत मिनी भारत सिमट गया हो, अलग-अलग पहनावे में अलग अलग बोली बोल रहे लोग लेकिन सब का भाव एक ही था, भीड थी लेकिन स्वनियंत्रित, अपार भीड़ को कोई नियंत्रित नहीं कर रहा था बावजूद इसके सब बेहद अनुशासित नजर आ रहे थे, उल्लास, उत्साह और उमंग के सागर में हुड़दंग का नामोनिशान नहीं था, यह अद्भुत और अनूठा आयोजन लोगों के विश्वास को और मजबूत कर रहा था, यही वजह है कि साल दर साल गोवर्धन में मुड़िया मेला पर जुटने वाली भीड़ बढ़ती जा रही है ।







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