विश्व स्तनपान दिवस : सप्लीमेंट्री सकलिंग टेक्निक से संभव हुआ स्तनपान
विश्व स्तनपान दिवस : सप्लीमेंट्री सकलिंग टेक्निक से संभव हुआ स्तनपान
-नवजात शिशुओं के पोषण में एसएसटी तकनीक साबित हो रही बेहतरीन कारगर
मथुरा । मां का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम आहार है, इसके लिए स्तनपान जरूरी है, स्तनपान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हर वर्ष एक से 7 अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाता है, इस वर्ष की थीम "जीवन की स्थायी शुरुआत के लिए स्तनपान: जो कारगर है उसे मजबूत करें" के साथ यह सप्ताह मनाया जा रहा है, जिला अस्पताल स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र की चिकित्सा अधिकारी डॉ0 तन्वी दुआ ने बताया कि नवजात शिशुओं के पोषण के लिए अपनाई जा रही सप्लीमेंट्री सकलिंग टेक्निक (एसएसटी) कारगर साबित हो रही है ।

डायटिशियन डॉ0 मयंक सारस्वत के मार्गदर्शन में एसएसटी का प्रयोग करने पर दो माह की अनन्य ने सिर्फ 48 घंटे में ही मां का दूध पीना शुरू कर दिया, उन्होंने बताया कि अनन्य को कमजोरी के कारण एनआरसी (न्यूट्रीशनल रिहैबिलिटेशन सेंटर) में भर्ती कराया गया है, यहां डॉ0 मयंक सारस्वत ने बच्चे को स्तनपान कराने के लिए एसएसटी तकनीक का इस्तेमाल किया, इस तकनीक की मदद से बच्चे ने तेजी से स्तनपान सीखा और मां में भी दूध का स्राव बढ़ने लगा, जिला अस्पताल के डायटिशियन डॉ0 सारस्वत ने बताया कि जो बच्चे स्तनपान नहीं कर रहे हैं या करना छोड़ दिया है, उन्हें सप्लीमेंट्री सकलिंग टेक्निक (एसएसटी) से स्तनपान कराया जा सकता है ।
उन्होंने बताया कि एसएसटी एक प्रक्रिया है जिसमें बच्चे को आर्टिफिशियल तरीके से स्तनपान कराया जाता है, इसमें एक पतली नली प्रयोग होती है, नली के दोनों सिरे खुले होते हैं, इक सिरे को मां के स्तन पर लगाया जाता है, दूसरे सिरे को दूध से भरी कटोरी में लगाया जाता है, कटोरी को मां के कंधे के पास रखते हैं, इसके बाद बच्चे को स्तनपान कराया जाता है, जब दूध नली से बच्चे के मुंह में जाता है तो बच्चे को लगता है कि दूध मां के स्तन से आ रहा है और बच्चा दूध पीना शुरू कर देता है, यह प्रक्रिया दो से तीन दिन लगातार कराने पर जो बच्चे स्तनपान छोड़ चुके हैं वह दोबारा स्तनपान करना शुरू कर देते हैं और मां को भी दूध आने लगता है ।
उन्होंने ने बताया कि एसएसटी के जरिए मां और बच्चे के बीच का जुड़ाव मजबूत होता है और बच्चे को प्राकृतिक पोषण मिलता है, इसके सकारात्मक परिणाम के बाद अब बच्चे की सेहत में सुधार हो रहा है, अभी भी बच्चा एनआरसी में डॉक्टरों की निगरानी में भर्ती है, जिला मातृ स्वास्थ्य सलाहकार मुकेश गौतम का कहना है कि जन्म के एक घंटे के भीतर मां का पहला पीला गाढ़ा दूध यानी कोलोस्ट्रम पिलाना और 6 महीने तक सिर्फ स्तनपान कराना बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए बेहद जरूरी है ।
बरसाना ब्लॉक के नंदगांव निवासी 26 वर्षीय डॉली बताती है कि मेरे बच्चे का जन्म एक जून को घर पर ही हुआ था, गांव के रिवाज के अनुसार जन्म के बाद बच्चे को ऊपर का दूध दिया गया और मां का दूध छठी नहाने के बाद पिलाया गया, कुछ दिन में ही बच्चे की तबियत बिगड़ने लगी, इसके बाद जानकारी होने पर क्षेत्र की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता शीला आईं, उन्होंने बच्चे को पोषण पुनर्वास केंद्र ले जाने के लिए कहा। पोषण पुनर्वास केंद्र में डायटिशियन डॉ0 मयंक द्वारा जांच में पाया कि बच्चे का वजन 2.7 किलोग्राम वजन था, बच्चा सही से मां का दूध पी नहीं पा रहा था, वजन भी नहीं बढ़ रहा था, इसके बाद में पोषण पुनर्वास केंद्र में एसएसटी (सप्लीमेंट्री सकलिंग टेक्नीक) के द्वारा बच्चे को दूध पिलाया गया, अब बच्चा मां का दूध पी पा रहा है और बच्चे की तबियत में सुधार हो रहा है ।







.jpeg)







