आधुनिकता के दौर में ब्रजवासी मना रहे "भूली बिसरी सी होली"
आधुनिकता के दौर में ब्रजवासी मना रहे "भूली बिसरी सी होली"
-दुनिया ब्रज में आ रही है तो होली से दूर जा रहे हैं ब्रजवासी, स्मृति में रह गई होली की यादें
मथुरा । दुनिया में ब्रज की होली का डंका बज रहा है, सरकार लगातार होली को प्रचारित प्रसारित कर रही है, होली की व्यवस्थाओं को व्यापक बनाया जा रहा है, होली पर ब्रज में आने वाले पर्यटकों की संख्या में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है, इससे रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं, इसका दूसरा पहलू यह भी है कि ब्रजवासी लगातार होली से दूर हो रहे हैं, ब्रज में 45 दिन तक चलाने वाला होली का उत्सव अब सिकुड कर पांच दिन का भी नहीं रह गया है, इतना ही नहीं अभी तक समूचे ब्रज में नैसर्गिक रूप से खेले जाने वाली होली अब आयोजनों तक सीमित रह गई है ।
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मठ मंदिरों पर होने वाले चुनिंदा होली के आयोजन ही अब ब्रज की होली के नाम पर हो रहे हैं, आयोजनों के भी प्रयोजन तलाशे जा रहे हैं और इनके लिए प्रयोजक भी आगे आ रहे हैं, ब्रज की नैसर्गिक होली अब इवेंट का रूप लेती जा रही है जिसमें दूसरे से बहुत भव्यता नजर आती है लेकिन होली का आनंद नदारद रहता है, आधुनिकात, व्यस्तता, व्यवस्था और बेचारगी से ब्रज की परंपरागत होली के रंग फीके पड रहे हैं, आज जनमानस में होली का उल्लास अब नजर नहीं आ रहा हैं, बृजवासी होली पर बस होली बातें याद कर ही खुद को सांत्वना दे रहे हैं, उनके जेहन में वह होली अभी जीवित है जिसे ब्रज की होली कहा जाता है, पीढ़ी बदलने के साथ ही यह यादें भी विस्मृत हो जाएंगी और समय के साथ ब्रज की सच्ची होली भी ।
गलियों में ’सांखी के स्वर’ अब नहीं गूंजते हैं, रात के प्रथम पहर से भोर तक गांवों में गूंजने वाले ’सांखी’ के स्वर अभी कानों में नहीं पड़ते हैं, यह होली गायन और होली खेलने की ब्रज की प्रमुख विधा रही है, इस विधा में हुरियारों की टोली की ओर से गाये जाने वाले होरी के रसिया का हुरियारिनों की टोली रसिया गाकर जवाब देती हैं, लयबद्ध और चरणबद्ध यह गायन बेहद मनोरंजक, अर्थपूर्ण और होली की मस्ती से सराबोर होता है, हुरियारिनों के हाथों में लाठियां रहती हैं, वह रसिया के आखिरी चरण में अपनी लाठियों से हुरियारों पर प्रहार करती हैं, उन्हें पीछे धकेलती हैं, हुरियारे अपने हाथों में लाठियों को थामे रहते हैं, इन लाठियों के सहारे बचाव की मुद्रा में रहते हैं, हुरियारिनें रसिया गाते हुए हुरियारों को पीछे धकलती है,ं हुरियारे ढाल की तरह लाठी को बचाव में उपयोग करते हैं, इसके बाद फिर तितर बितर हुए हुरियारे एकत्रित होते हैं और रसिया गाते हैं, हुरियारिन जाबव में रसिया गाती हैं और लाठियों के प्राहर करती हैं, प्रेम पगी लाठियों के प्रहारों को सहने और बचाव करने का यह क्रम निरंतर जारी रहता है।
बरसाना में अभी तक लड्डू होली भी लठामार होली जितनी ही उल्लासित करने वाली होती थी, अब लड्डू होली का स्वरूप बदल गया है, अभी तक पहाड़ी पर स्थित राधा रानी मंदिर की प्राचीर से लड्डुओं की बरसात होती थी, यह मनोरम, मनमोहक दृश्य जो भी अपनी आंखों से देखता था कभी भुला नहीं पाते थे, अब लड्डू होली का स्वरूप बदल रहा है, अब लड्डुओं की बरसात नहीं होती है, यह प्रतीकात्मक रह गई है, सिर्फ गोस्वामीजन आपस में एक दूसरे के ऊपर लड्डू फेंक कर ही इस आयोजन की परंपरा को निभा रहे हैं, होली पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम पर इवेंट आयोजित करने की ललक लगातार बढ रही है, नामचीन कलाकारों को महंगे दामों पर बुलाकर इवेंट कराये जा रहे हैं, इवेंट का हिस्सा बनने वालों को प्रवेश शुल्क के रूप में कीमत चुकानी होती है, इससे कलाकारों और आयोजकों का खर्च निकल आता है, वहीं होली का मर्म भूल रहे लोगों को मनोरंजन का माध्यम मिल जाता है, देर रात तक चलने वाली पार्टियों की तरह होली के नाम पर ये आयोजन अब लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं ।







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