अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस : वीरान हो रहा ब्रज, ओझल पशु पक्षियों की प्रजातियां

अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस : वीरान हो रहा ब्रज, ओझल पशु पक्षियों की प्रजातियां
-हालांकि कुछ स्थानों पर विदेशी पक्षियों की आमद से मिलती हैं खुशी, अपनों को बचाने की नही छटपटाहट
    मथुरा । वर्तमान समय में ब्रज का प्राकृतिक परिवेश और जैव विविधता गंभीर संकट में है, बढ़ते कंक्रीट के जंगलों, अंधाधुंध कटाई, घटते जलस्रोतों (जैसे कुंड और तालाब) और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से पशु पक्षियों के प्राकृतिक आवास छिन गए हैं, नतीजतन कई दुर्लभ प्रजातियां मथुरा और आसपास के क्षेत्रों से तेजी से विलुप्त हो रही है, पर्यावरण को स्वच्छ रखने वाले गिद्ध अब ब्रज में शायद ही दिखाई देते हैं, इसके अलावा नीलकंठ, तीतर, बटेर, और छोटी चिड़ियों जैसे घरेलू गौरैया और हुदहुद की संख्या में भारी गिरावट आई है ।
   यमुना के घाटों और आर्द्रभूमि (वेटलैंड) में सर्दियों के मौसम में आने वाले विदेशी परिंदों (जैसे विभिन्न प्रजातियों की बतखें और सारस) की आवक में भारी कमी आई है, जंगलों के सिमटने से नीलगाय, सियार, और बंदरों की प्राकृतिक भोजन श्रृंखला प्रभावित हुई है, जिससे वे भोजन की तलाश में रिहायशी इलाकों में आने को मजबूर हैं, वनों की कटाई और पेड़ों के कम होने से पक्षियों के घोंसला बनाने की जगहें खत्म हो गई है, ब्रज के पारंपरिक तालाब, पोखर और जोहड़ सूख गए हैं जिससे गर्मियों में पक्षियों और आवारा पशुओं के लिए पीने के पानी का संकट पैदा हो गया है, खेतों में अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग से पक्षियों को प्राकृतिक भोजन (कीट-पतंगे) नहीं मिल पा रहा है ।  
   पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के लिए काम करने वाले संगठनों का मानना है कि ब्रज की खोई हुई जैव विविधता को वापस लाने के लिए स्थानीय स्तर पर पौधारोपण, जलस्रोतों के संरक्षण और जैविक खेती को बढ़ावा देना अनिवार्य है, देखते ही देखते यमुना जलचर विहीन हो गई हैं, भारी प्रदूषण से पहले जलीय पादप खत्म हुए, इसके बाद जलीय जीवों पर संकट मढराया, आज भी आस्था के चलते तमाम लोग यमुना में खेरीज यानी खतु के सिक्के फेंकते दिख जाएंगे, यह क्रम तब शुरू हुआ था जब तांबे के सिक्के थे और माना जाता था कि तांबा पानी को शुद्ध करता है, वर्तमान में जो सिक्के डाले जा रहे हैं, वह नुकसान ही पहुंचा रहे हैं, दो से तीन दशक में हालत बद से बदतर हो गई है, कभी किसान नहर राजवाह में आने वाले पानी को भी प्यास लगने पर पी लेता था, अब भू गर्भीय जल पीने योग्य नहीं रहा है ।
    जैव विविधता का जब भी जिक्र होता है, बात पशु पक्षियों पर केन्द्रित हो जाती है, ब्रज को वन उपवनों के लिए जाता है, झील कुंडों के लिए जाना जाता है लेकिन यह सब अब कहने सुनने की बात रह गई हैं, चित्रों में दर्शाने भर से संतुष्टि हासिल कर ली जाती है, हालत यह हो गई है ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा मार्ग में परिक्रमार्थियों को पेड़ की छांव तलाशी पड़ रही है, कभी वन और उपवन ही ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा में पड़ाव स्थल होते थे। तालाब कुंड पानी के स्रोत होते थे, प्रकृति की गोद में परिक्रमा रमणीय लगती थी, अब सिर्फ कंकरीट का मार्ग, कहीं समतल कहीं उबड खाबड, न तालाब, न कुंड, न सरोवर, न वन न उपवन पीने के लिए कहीं पानी के पाउच सहाना बन रहे हैं तो कहीं ब्रजवासियों द्वारा की जा रही परिक्रमार्थियों की सेवा ही सहारा है ।

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